नई दिल्ली: रक्षा सचिव राजेश सिंह ने एक अहम जानकारी देते हुए बताया है कि यूरोप अब भारत में बने सैन्य उपकरणों के लिए एक फल-फूल रहा बाजार बन गया है। उन्होंने कहा कि भारत यूरोप को हथियार निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बनकर उभरा है। इसका मुख्य कारण रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद शुरू की गई 'रीआर्म यूरोप' पहल है। उन्होंने आगे बताया कि अब यूरोप में बड़ी मात्रा में अलग-अलग तरह के मानक गोला-बारूद भेजे जा रहे हैं, जिनमें आर्टिलरी शेल (तोप के गोले) और छोटे-बड़े कैलिबर वाले राउंड शामिल हैं। निर्यात की जाने वाली अन्य चीजों में बुलेटप्रूफ जैकेट और हेलमेट, छोटे हथियार तथा विमान के पुर्जे भी शामिल हैं।यूरोपीय संघ के साथ भारत ने पहली रक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर किए
रक्षा सचिव ने कहा कि भारत ने यूरोपीय संघ के साथ अपनी पहली सुरक्षा और रक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर किए हैं, और साथ ही भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को भी अंतिम रूप दिया है। नई दिल्ली के कई यूरोपीय देशों के साथ द्विपक्षीय औद्योगिक रोडमैप भी हैं। विदेशी साझेदारियों पर उन्होंने कहा कि भारत का रक्षा सहयोग अब मुख्य रूप से मित्र देशों के साथ मिलकर तकनीक के सह-उत्पादन , सह-विकास और संयुक्त स्वामित्व पर केंद्रित हो रहा है।उन्होंने कहा कि हमारा इरादा इन मित्र विदेशी देशों के साथ मिलकर कई रक्षा तकनीकों को विकसित करने, उनका उत्पादन करने और उन पर संयुक्त स्वामित्व रखने का है। उन्होंने आगे कहा कि इसका एक उद्देश्य भारतीय आपूर्तिकर्ताओं को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का हिस्सा बनाना भी है।
पिछले 10 वर्षों में भारत के रक्षा निर्माण का काफी विस्तार हुआ
रक्षा सचिव ने आगे अहम जानकारी देते हुए बताया कि पिछले 10 वर्षों में भारत के रक्षा विनिर्माण तंत्र में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। देश में 16 बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियों के अलावा लगभग 840 बड़ी और मध्यम आकार की निजी कंपनियां तथा स्टार्टअप समेत करीब 17,000 छोटे उद्यम इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस विविध औद्योगिक आधार का असर घरेलू बिक्री के आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है, जो अब लगभग 17 अरब यूरो तक पहुंच गई है।भारत 80 से अधिक देशों को रक्षा सामग्री निर्यात कर रहा
रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा कि भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा सामग्री का निर्यात कर रहा है। सरकार की कोशिश है कि हर साल लगभग 20 से 25 अरब डॉलर के रक्षा पूंजीगत व्यय का 75 प्रतिशत हिस्सा देश के भीतर खर्च किया जाए। इसके तहत भारतीय डिजाइन, विकास और विनिर्माण वाले उत्पादों यानी आईडीडीएम (आईडीडीएम) को प्राथमिकता दी जा रही है, ताकि देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता सुनिश्चित हो सके। उन्होंने कहा कि भारत का रक्षा निर्यात केवल भारी तोपों और गोला-बारूद तक सीमित नहीं है। इसमें हेलमेट, बुलेटप्रूफ जैकेट जैसे सामरिक उपकरणों से लेकर छोटे हथियार भी शामिल हैं।रक्षा सचिव ने पश्चिमी देशों का किया जिक्र
अपने पश्चिमी पड़ोसी के साथ भारत के हालिया संघर्ष का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे मामले में, हम अपने लक्ष्य हासिल करने के बाद संघर्ष को खत्म करने में सफल रहे। रक्षा सचिव ने कहा कि भारत ने घरेलू स्तर पर ड्रोन का एक व्यापक इकोसिस्टम तैयार किया है। यहां के स्थानीय निर्माता, उपकरणों में और सुधार की गुंजाइश के साथ, चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सेना की जरूरतों को पूरा करने में तेजी से सक्षम हो रहे हैं।