अमेरिकी हथियारों से लैस भारतीय नौसेना ने क्यों ठुकराया F/A-18 सुपर हॉर्नेट? राफेल-M क्यों है गेमचेंजर

Updated on 24-10-2026 11:21 AM
पेरिस/नई दिल्ली: भारतीय नौसेना के समुद्री प्लेटफॉर्म से राफेल-मरीन लड़ाकू विमानों का ट्रायल शुरू हो गया है। राफेल-एम को फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट ने बनाया है और इसने अमेरिकी F/A-18E/F सुपर हॉर्नेट को रेस में हराकर भारतीय नौसेना का कॉन्ट्रैक्ट जीता था। सबसे दिलचस्प बात ये है भारतीय नौसेना के बेड़े में कई अमेरिकी हथियार हैं और बोइंग ने उम्मीदें पाल रखीं थीं कि सुपर हॉर्नेट राफेल मरीन पर भारी पड़ेगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।


राफेल मरीन ने रेस में सुपर हॉर्नेट को कैसे पीछे छोड़ दिया?

  • भारत सरकार ने अप्रैल-2025 में अपने MiG-29K को बदलने के लिए 26 राफेल मरीन का ऑर्डर फ्रांस को दिया था।
  • ये MiG-29K लड़ाकू विमान अभी भारतीय एयरक्राफ्ट कैरियर INS विक्रमादित्य और INS विक्रांत से ऑपरेट होते हैं।
  • कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर होने के एक साल से बाद अब भारतीय नौसेना गोवा में INS हंसा स्थित 'शोर-बेस्ड टेस्ट फैसिलिटी' (SBTF) में राफेल-M का परीक्षण कर रही है। फ्रांसीसी विमानों को समायोजित करने के लिए नौसेना अपने विमान वाहक पोतों में कुछ छोटे-मोटे बदलाव करने पर विचार कर रही है।
ये छोटे बदलाव इसलिए किए जा रहे हैं ताकि राफेल-M लड़ाकू विमानोंको मूल रूप से CATOBAR (कैटापल्ट असिस्टेड टेक-ऑफ बट अरेस्टेड रिकवरी) सिस्टम वाले एयरक्राफ्ट कैरियर जैसे कि फ्रांसीसी पोत 'चार्ल्स डी गॉल' से ऑपरेट होने के लिए डिजाइन किया गया था। इसके विपरीत भारतीय एयरक्राफ्ट कैरियर STOBAR (शॉर्ट टेक-ऑफ बट अरेस्टेड रिकवरी) सिस्टम का उपयोग करते हैं।

INS विक्रांत एयरक्राफ्ट कैरियर की लिफ्ट का पेंच

इसके अलावा राफेल-M के पंखों का फैलाव (wingspan) लगभग 10.9 मीटर है। मिग-29K के विपरीत इसे इस तरह डिजाइन नहीं किया गया है कि इसके पंखों को मोड़ा जा सके जिससे डेक पर कम जगह घेरी जा सके। इस वजह से यह डेक या हैंगर पर ज्यादा जगह घेरता है। इसलिए नौसेना कुछ छोटे-मोटे प्रक्रियात्मक समाधानों पर विचार कर रही है। जैसे विंगटिप पर लगी मिसाइल लॉन्च रेल को अस्थायी रूप से हटाकर इसके फैलाव को लगभग 9.6 मीटर तक कम किया जा सकता है। इसके साथ ही विमानों को संभालने और उन्हें रखने की व्यवस्था में भी कुछ बदलाव किए जा सकते हैं।

राफेल मरीन की डिलीवरी 2028 से होगी शुरू

राफेल-एम लड़ाकू विमानों की डिलीवरी 2028 में शुरू होने और 2030 तक पूरी होने की उम्मीद है। यह एक दशक में पहली बार होगा जब भारतीय नौसेना किसी गैर-रूसी या पश्चिमी लड़ाकू विमान का इस्तेमाल करेगी। इससे पहले नौसेना के पास पश्चिमी देशों का जो आखिरी कैरियर-आधारित लड़ाकू विमान था वह ब्रिटिश 'सी हैरियर' था। तीन दशकों से ज्यादा समय तक सेवा देने के बाद 2016 में इसे रिटायर कर दिया गया था।

भारतीय नौसेना के बेड़े में अमेरिकी विमानों का दबदबा

  • भारतीय नौसेना अमेरिका में बने कई तरह के उपकरणों का इस्तेमाल करती है जिनमें हेलीकॉप्टर से लेकर जासूसी विमान तक शामिल हैं। ऐसे में फ्रांसीसी कैरियर-आधारित जेट का चुनाव काफी दिलचस्प हो जाता है।
  • भारत ने जनवरी 2009 में पहली बार आठ अमेरिकी P-8I विमानों का ऑर्डर दिया था और ऐसा करने वाला वह इस विमान का पहला अंतरराष्ट्रीय ग्राहक बन गया।
  • 2016 में, भारत ने चार और विमानों का एक अतिरिक्त ऑर्डर दिया। इससे समुद्री निगरानी, ​पनडुब्बी-रोधी युद्ध और ISR (खुफिया जानकारी जुटाने, निगरानी और टोह लेने) क्षमताओं में काफी वृद्धि हुई। फरवरी 2026 में रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने P-8I की एक और खरीद को आधिकारिक तौर पर मंजूरी दे दी।
  • भारतीय नौसेना ने फरवरी 2020 में 24 MH-60R सीहॉक मल्टी-मिशन नौसैनिक हेलीकॉप्टरों का ऑर्डर दिया था। अब तक 21 हेलीकॉप्टर मिल चुके हैं और बाकी के 2027 तक आने की उम्मीद है।
  • नौसेना ने 2020 से अमेरिका की कंपनी 'जनरल एटॉमिक्स' से दो MQ-9B सी गार्जियन ड्रोन लीज पर लिए हैं। अगस्त 2026 में हुए एक समझौते के तहत दो और ड्रोन लीज पर लेकर इनकी संख्या बढ़ाई जा रही है।
  • अक्टूबर 2024 में भारत ने अमेरिका के साथ 3.3 अरब डॉलर का एक समझौता किया जिसके तहत 31 'MQ-9B हाई-एल्टीट्यूड लॉन्ग-एंड्योरेंस' (HALE) UAV खरीदे जाएंगे।
  • इसके अलावा पिछले कुछ वर्षों में भारतीय नौसेना ने अमेरिका से कई घातक हथियार भी हासिल किए हैं। इनमें AGM-84 हार्पून ब्लॉक II एंटी-शिप मिसाइल, Mk 54 हल्के टॉरपीडो और AGM-114 हेलफायर मिसाइलें शामिल हैं।
  • इतनी महंगी और महत्वपूर्ण खरीद के बावजूद भारतीय नौसेना ने कभी भी कोई अमेरिकी लड़ाकू विमान नहीं खरीदा है और न ही उसका संचालन किया है। जब नौसेना को अमेरिकी विमान F/A-18E/F सुपर हॉर्नेट खरीदने का मौका मिला तो उसने इसके बजाय राफेल-M को चुना।
  • भारत ने सुपर हॉर्नेट के बजाय राफेल-M को क्यों चुना?

    बोइंग ने सुपर हॉर्नेट को एक ऐसे जेट के रूप में पेश किया जिसके लिए बहुत कम सपोर्ट उपकरणों की जरूरत होती है। इसमें मिशन के लिए हमेशा तैयार रहने की उच्च क्षमता के बावजूद प्रति उड़ान घंटे का खर्च भी काफी कम आता है। कंपनी ने भारतीय नौसेना को लुभाने के लिए यह भी बताया कि यह विमान एक 'फोर्स मल्टीप्लायर' साबित होगा क्योंकि यह P-8I और अमेरिका में बने अन्य सिस्टम्स के साथ आसानी से जुड़ सकता है जिनका इस्तेमाल भारतीय नौसेना पहले से ही कर रही है।
  • ट्रायल्स में कहां भारी पड़ा राफेल-एम?

    इसके बाद दोनों जेट्स का जमीन पर बनी एक सुविधा में काफी कड़ा परीक्षण किया गया। इसमें 'स्की-जंप' और 'कैटापल्ट' लॉन्चर दोनों तरह से उड़ान भरने के ट्रायल शामिल थे। बताया जाता है कि दोनों विमान भारतीय नौसेना की जरूरतों को पूरा करते थे लेकिन आखिरकार राफेल-M ने बाजी मार ली।

    यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट में राफेल-मरीन और सुपर हॉर्नेट दोनों उड़ा चुके भारतीय नौसेना के एक पायलट ने नाम नहीं बताने की शर्त पर कहा कि दोनों ही लड़ाकू विमान काफी शानदार हैं और एक दूसरे को कड़ा टक्कर देते हैं। लेकिन राफेल-मरीन हल्का है जबकि एफ-18 काफी भारी है। इसलिए जब एयरक्राफ्ट कैरियर पर 'अरेस्टेड लैंडिंग' की बात आती है तो राफेल में ज्यादा लचीलापन होता है।
  • भारतीय वायुसेना के साथ तालमेल

    भारतीय वायुसेना जिन राफेल विमानोंका इस्तेमाल करती है उनका राफेल मरीन से काफी समानताएं हैं। इसका मतलब यह है कि कई पुर्जे, उपकरण और टेस्ट किट दोनों में इस्तेमाल किए जा सकते हैं। साथ ही भारत ग्राउंड-सपोर्ट सिस्टम, सिमुलेटर और डायग्नोस्टिक सॉफ्टवेयर को भी शेयर कर सकता है। इसके अलावा भारत ने पहले ही IAF के राफेल विमानों के लिए मेंटेनेंस इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षित तकनीशियन और सप्लाई चेन तैयार कर रखी है जो राफेल-M के लिए भी मददगार साबित हो सकती है।

    इसीलिए नौसेना ने शायद यह आकलन किया होगा कि राफेल-M को शामिल करने से मेंटेनेंस सुविधाओं, स्पेयर पार्ट्स, लॉजिस्टिक्स और भविष्य में होने वाले ओवरहॉल (मरम्मत) के खर्च में कमी आएगी। वहीं अगर सुपर हॉर्नेट को शामिल किया जाता तो उसके लिए एक पूरी तरह से अलग सपोर्ट इकोसिस्टम बनाना पड़ता।
  • भारत ने कभी भी अमेरिकी लड़ाकू विमान नहीं खरीदे हैं जिसके पीछे कई कारण हैं। जैसे कि एक्सपोर्ट कंट्रोल और उनके इस्तेमाल पर लगी पाबंदियां। कनाडा, फिनलैंड, जर्मनी, पोलैंड और स्विट्जरलैंड जैसे संभावित ग्राहकों के बीच अपने 'ब्लॉक III' जेट की मार्केटिंग करने की भरपूर कोशिशों के बावजूद बोइंग कोई नया कॉन्ट्रैक्ट हासिल करने में नाकाम रहा। उसे साब ग्रिपेन, डसॉल्ट राफेल और लॉकहीड मार्टिन F-35 जैसे अपने प्रतिस्पर्धियों से लगातार मात खानी पड़ी।

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