किस्मत इंसान को कब कहां पहुंचा दे, कोई नहीं जानता। आज हम एक ऐसी ही शख्सियत का किस्सा बताने जा रहे हैं, जो कभी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज का हिस्सा थे। स्वतंत्रता की लड़ाई में हिस्सा लिया। एक बार गुस्सा आया तो अंग्रेज को ट्रेन से नीचे फेंक दिया। गिरफ्तारी से बचने के लिए बिना सोचे-समझे दूसरी ट्रेन में चढ़ गए। किस्मत ने मुंबई पहुंचा दिया। उधर, गांव में घरवालों को लगा कि देश के लिए लड़ते हुए उनके लाल की जान चली गई। अंतिम संस्कार की तैयारी होने लगी। लेकिन तभी एक गांव वाले की नजर फिल्मी पर्दे पर पड़ी। हम बात कर रहे हैं एक्टर रामायण तिवारी की, जिन्होंने अपने 36 साल के करियर में 160 से अधिक फिल्मों में काम किया। आम तौर पर वह विलेन के किरदार में दिखते थे। देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर शिव सेना चीफ बाला साहब ठाकरे तक से इनका राबता रहा। बिमल रॉय, राज कपूर, दिलीप कुमार और सुनील दत्त जैसे दिग्गजों के साथ काम करने वाले ये वही 'तिवारी' हैं, जिन्होंने भोजपुरी इंडस्ट्री की पहली और दूसरी फिल्म बनाई।रामायण तिवारी बॉलीवुड में अपने सरनेम 'तिवारी' से ज्यादा मशहूर थे। उन्होंने 'मधुमती', 'यहूदी', 'जिस देश में गंगा बहती है', 'मेरा साया', 'कल आज और कल', 'नील कमल' जैसी कई सुपरहिट फिल्मों में काम किया है। बिहार के मनेर में रामायण तिवारी का जन्म 1917 में हुआ था। साल 1980 में मुंबई में उन्होंने आखिरी सांस ली। उनके बेटे भूषण तिवारी भी बॉलीवुड में बेहतरीन कैरेक्टर आर्टिस्ट हुए। जबकि उनके पोते सुजीत तिवारी आज भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के बड़े निर्माता हैं।मैट्रिक तक की पढ़ाई, जमींदार भूमिहार परिवार और दिल में जलती क्रांति
सुजीत तिवारी बताते हैं कि जब देश आजाद हुआ, तब उनके दादा जी रामायण तिवारी तीस साल के हो चुके थे। जाहिर तौर पर जब देश अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, तब रामायण तिवारी युवा थे। 15-16 साल की उम्र में ही उन्होंने अग्रेंजी शासन खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया था। उन्होंने मैट्रिक तक की पढ़ाई की थी। स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने के लिए उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। हालांकि, माता-पिता के दबाव में वह कई साल अपने खेतों में काम करते रहे। वह एक जमींदार भूमिहार परिवार से थे।
आजाद हिंद फौज के सदस्य बने, अंग्रेज को ट्रेन से बाहर फेंक दिया
जब आजाद हिंद फौज का गठन हुआ, तब रामायण तिवारी के कुछ दोस्त उससे जुड़े। तिवारी साहब को भी मौका मिला। उन्होंने भी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आजाद हिंद फौज की सदस्यता ली। फिर एक दिन देश के लिए अपने एक दोस्त संग गांव छोड़ दिया। दोनों ट्रेन में सवार होकर कहीं जा रहे थे, लेकिन तभी रास्ते में एक अंग्रेज से विवाद हो गया। गुस्से में रामायण तिवारी ने उस अंग्रेज को ट्रेन से बाहर फेंक दिया। अब गिरफ्तारी का डर सता रहा था, इसलिए वह अगले ही स्टेशन पर उस ट्रेन से उतर गए और बिना सोचे-समझे एक दूसरी ट्रेन में सवार हो गए।ट्रेन ने पहुंचा दिया बंबई, प्रभात स्टूडियो में मिली नौकरी
कहना गलत नहीं होगा कि उस दिन रामायण तिवारी ने ट्रेन नहीं बदली थी, बल्कि वह अपनी किस्मत पर सवार हुए थे। जब ट्रेन काफी आगे निकल आई, तब तिवारी साहब ने यात्रियों से पूछा और खबर लगी ये ट्रेन बंबई जा रही है। मायानगरी पहुंचने पर शुरुआत में कुछ दिन संघर्ष में बीते। ना रहने का ठिकाना, ना खाने के लिए पैसे। जैसे तैसे एक उन्हें प्रभात स्टूडियो में नौकरी मिल गई। वह दिन में स्टूडियो की नौकरी करते और रात को मुंबई में आजादी के लिए आंदोलन में जुटे क्रांतिकारियों से मिलते।
रामायण तिवारी की डेब्यू फिल्म, यहां भी किस्मत से मिल गया रोल
रामायण तिवारी की फिल्मों में एंट्री कैसे हुई, इसका किस्सा भी कम दिलचस्प नहीं है। बताया जाता है कि जिस प्रभात स्टूडियो में वो काम करते थे, वहां फिल्म 'मन मंदिर' की शूटिंग चल रही थी। उस दिन फिल्म में काम कर रहा एक एक्टर सेट पर नहीं पहुंचा था। लेकिन शूटिंग हर हाल में होनी थी। लिहाजा, डायरेक्टर की नजर रामायण तिवारी पर पड़ी और उन्होंने वह रोल उन्हें दे दिया। किरदार छोटा था, लेकिन रामायण तिवारी ने शिद्दत के साथ उसे निभाया। इसके लिए अच्छे खासे पैसे भी मिले। देखते ही देखते, उनका फिल्मी करियर चल पड़ा।
गांव में अंतिम संस्कार की थी तैयारी, तभी पर्दे पर दिख गए रामायण तिवारी
साल 1947 में जब देश आजाद हुआ, तब रामायण तिवारी ने एक्टिंग को ही अपना करियर बना लिया। लेकिन इन सब में करीब 8-10 साल बीत गए थे और उन्होंने अब तक अपने गांव और घर से कोई संपर्क नहीं किया था। मनेर गांव में सब मान बैठे थे कि रामायण अब इस दुनिया में नहीं है। उनके अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू हो गई थीं। लेकिन इसी बीच एक ट्विस्ट आया। गांव का एक युवक सिनेमाघर कोई फिल्म देखने पहुंचा, जिसमें रामायण तिवारी थे। अब पूरे मनेर गांव में शोर मच गया। वहां उत्सव जैसा माहौल बन गया। पूरा गांव सिनेमाघर पहुंच गया। दिलचस्प ये कि कुछ ही दिनों बाद रामायण तिवारी भी बेचैन होकर घरवालों की याद में गांव पहुंच गए।
जय प्रकाश नारायण, डॉ. राजेंद्र प्रसाद से थी नजदीकियां
रामायण तिवारी ने 'पत्थर के सनम', 'गोपी', 'दुश्मन', 'दो बीघा जमीन' और 'पोस्ट बॉक्स नंबर 999' सरीखी जितनी भी फिल्मों में काम किया, वहां पर्दे पर क्रेडिट में उन्हें 'तिवारी' नाम ही दिया गया। बताया जाता है कि रामायण तिवारी की लोक नायक जय प्रकाश नारायण से अच्छी पहचान थी। वह जब भी मुंबई आते थे रामायण तिवारी के घर पर ही ठहरते थे। यही नहीं, आजाद भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद भी तिवारी के प्रशंसकों में से थे। शिव सेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे की जीवनी 'द राइज ऑफ शिवसेना एंड बाल ठाकरे' में भी रामायण तिवारी की चर्चा है।
भोजपुरी की पहली फिल्म बनाने का श्रेय, डॉ. राजेंद्र प्रसाद से चर्चा
बॉलीवुड में सैकड़ों फिल्मे करने के बाद रामायण तिवारी ने अपनी मातृ बोली भोजपुरी को भी संवारने का काम किया। आज जो भोजवुड है, वहां पहली फिल्म बनाने का बड़ा श्रेय भी तिवारी जी को ही जाता है। यह फिल्म थी 'गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो', जिस पर काम करने से पहले उन्होंने डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से इसकी चर्चा की थी। रामायण तिवारी ने ही फिल्म के संगीत और रिलीज की जिम्मेदारी संभाली थी।
मनेर में हुई थी शूटिंग, उसी साल दूसरी भोजपुरी फिल्म भी बनाई
'गंगा मैया तोहे पियरी चढ़इबो' में रामायण तिवारी ने एक्टिंग भी की। कुंदन कुमार के डायरेक्शन और विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी द्वारा निर्मित यह फिल्म 1963 में रिलीज हुई थी। इसमें कुमकुम, असीम कुमार और नजीर हुसैन मुख्य भूमिकाओं में थे। यह विधवा पुनर्विवाह के विषय पर आधारित थी। इस फिल्म की पूरी शूटिंग मनेर गांव में ही हुई थी। फिल्म के सारे कलाकार रामायण तिवारी के घर पर ही रुके थे। भोजपुरी की दूसरी फिल्म 'लागी छूटे नाही राम' भी रामायण तिवारी ने ही बनाई। वह उस फिल्म के प्रोड्यूसर भी थे, जो उसी साल 1963 में ही रिलीज हुई थी।