
तिरंगे के बनने की असली कहानी तब शुरू होती है, जब जर्मनी के स्टटगार्ड शहर में 22 अगस्त, 1907 को समाजवादियों की दूसरी बड़ी सभा हुई। सभा में जोर-शोर से स्पीच दी जा रही थी, तभी वहां मौजूद मुंबई की एक पारसी क्रांतिकारी महिला भीकाजी रुस्तमजी कामा अचानक उठ खड़ी हुईं और ब्रिटिश भारत के यूनियन जैक झंडे को नकारते हुए हरी, पीली और लाल रंग की पटि्टयों वाला तिरंगा झंडा फहरा दिया, जिस पर सफेद रंग में वंदे मातरम् लिखा था। भीकाजी ने झंडा फहराते हुए पूरे जोश में वंदे मातरम् और भारत माता की जय के नारे लगाए। उन्होंने लोगों से कहा-ये आजाद भारत का झंडा है। मैं अपील करती हूं कि सब खड़े होकर इसे सलामी दें। मैडम कामा के इस एक्शन को देख वहां सभी लोग हक्के-बक्के रह गए।
अपनी साड़ी फाड़कर बना दिया झंडा, सबसे दिलवाई सलामी
कहते हैं कि मैडम कामा ने अपनी साड़ी फाड़कर ये झंडा तैयार किया था। फिर तो वो अमेरिका, फ्रांस, स्कॉटलैंड जहां-जहां भी गईं, झंडे को फहरातीं और पूरे जोश के साथ हिंदुस्तान की आजादी के लिए सहयोग मांगतीं। इतिहासकार डॉ. दानपाल सिंह के मुताबिक, मैडम कामा ने ही विदेश में भारत की आजादी की अलख जगाई, जिससे दुनिया को पता चला कि हिंदुस्तान भी अपनी आजादी के लिए लड़ाई लड़ रहा है। अमेरिका जाने वालीं वो भारत की पहली महिला प्रतिनिधि थीं।
केंद्र सरकार आजादी के 75 साल होने के अवसर पर हर घर तिरंगा अभियान चला रही है। यह मौका तिरंगे के संविधान सभा में बतौर राष्ट्रध्वज अपनाए जाने की 75वीं सालगिरह का भी है। कम ही लोगों को पता है कि जिस तिरंगे को हम शान से राष्ट्रध्वज कहते हैं, उसकी बुनियाद करीब 115 साल पहले मुंबई की एक क्रांतिकारी पारसी महिला भीकाजी रुस्तम कामा ने पहली बार विदेश में रखी थी। हम आपको तिरंगे के राष्ट्रध्वज बनाने में मैडम भीकाजी कामा के अहम योगदान को बताएंगे ही। साथ में सिस्टर निवेदिता, सुरैया तैयबजी, सरोजिनी नायडू और एनी बेसेंट की अहम भूमिकाओं का भी जिक्र करेंगे।
देश की राजधानी दिल्ली में भीकाजी कामा प्लेस एक चर्चित कमर्शियल कॉम्लेक्स है। वैसे तो यह एक तरह से मार्केट है, मगर यहां रहने वाले बेहद कम लोग ही जानते हैं कि ये नाम कहां से और क्यों आया। दिलचस्प यह है कि यहां से निकला रास्ता राजस्थान, गुजरात होते हुए मुंबई तक जाता है, जो भीकाजी कामा का जन्मस्थान भी है।
प्लेग फैला तो लंदन गईं, वहां श्यामजी कृष्ण वर्मा-लाला हरदयाल मिले
1861 को तब के बॉम्बे और आज के मुंबई में जन्मीं मैडम कामा के यूरोप जाने की कहानी भी एक संयोग ही है। 1896 में बॉम्बे में प्लेग फैल गया। वह पीड़ितों को बचाने में जुट गईं। हालांकि, इस दौरान वह खुद इसकी चपेट में आ गईं, तब प्लेग जानलेवा हुआ करता था और गांव के गांव उजड़ जाते थे। भीकाजी कामा इस महामारी से ठीक तो हो गईं, मगर उनकी सेहत पर इसका खराब असर पड़ा। डॉक्टरों ने उन्हें यूरोप जाने की सलाह दी और वह 1902 में लंदन चली गईं। यहीं उनकी मुलाकात भारतीय छात्रों की पढ़ाई और स्कॉलरशिप का इंतजाम करने वाले संगठन इंडिया हाऊस के संस्थापक श्यामजी कृष्ण वर्मा और गदर पार्टी के लाला हरदयाल से हुई। जो विदेश में रहकर भारतीय क्रांतिकारियों और राष्ट्रवादियों की मदद किया करते थे।