
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने देश की सबसे बड़ी पार्टी BJP से नाता तोड़कर एक बार फिर RJD से हाथ मिला लिया। नीतीश का यह कदम चौंकाने वाला था। नीतीश आठवीं बार बिहार के CM बने, लेकिन BJP राज्य की सत्ता से ही बेदखल हो गई। इतना ही नहीं, अब उसके सामने 2024 के लोकसभा चुनाव की टेंशन भी खड़ी हो गई है। ऐसा इसलिए, क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि नीतीश जिसके साथ रहे, उसका पलड़ा भारी रहता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि नीतीश के पास ऐसी कौन सी ताकत है, जो कम विधायक होने पर भी CM की कुर्सी पर वही कायम रहते हैं। वे जिस पार्टी के साथ जाना चाहते हैं, वही उनके एक इशारे पर साथ आने तैयार हो जाती है। इसके पीछे की बड़ी वजह है पार्टियों की मजबूरी, क्योंकि नीतीश का साथ होना बिहार के 16 प्रतिशत कुर्मी वोट की गारंटी है।
बिहार में 16% वोट की गारंटी हैं सुशासन बाबू
विधानसभा
चुनाव हो या लोकसभा चुनाव। हमेशा नीतीश कुमार का वोट प्रतिशत अच्छा ही रहा
है। विभाजित बिहार के बाद हुए लोकसभा चुनावों के आंकड़ों को देखें तो नीतीश
कुमार का विधानसभा की तुलना में लोकसभा चुनाव में ट्रैक रिकार्ड ज्यादा
बेहतर है। 2014 लोकसभा चुनाव को छोड़कर कभी उनका वोट प्रतिशत 22% से नीचे
नहीं रहा है। नीतीश को 2014 की मोदी लहर में भी 16% वोट मिले थे।
बिहार के साथ UP के 6% वोट पर नीतीश का असर
कुर्मी
समाज से आने वाले नीतीश कुमार बिहार के 16% वोट पर तो असर है ही, वे उत्तर
प्रदेश में भी BJP का गणित बिगाड़ सकते हैं। UP में कुर्मी समाज का वोट
करीब 6 प्रतिशत है। इनका प्रभाव प्रदेश के 25 जिलों में है। जबकि करीब 48
विधानसभा सीटें और 8-10 लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां कुर्मी समाज निर्णायक
भूमिका निभाता है।
UP में सपा नेता बेनीप्रसाद वर्मा और अपना दल के सोनीलाल पटेल के बाद कुर्मी समाज से कोई बड़ा चेहरा किसी भी पार्टी के पास नहीं है। BJP सोने लाल पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल के सहारे कुर्मी समाज को साधे हुए है, जबकि देश में कुर्मी नेता के तौर पर नीतीश कुमार खुद को स्थापित कर चुके हैं। ऐसे में आने वाले समय में नीतीश कुमार अकेले या कांग्रेस के साथ मिलकर UP में कुर्मी समाज के वोट बैंक को अपनी तरफ करना चाहेंगे।