वैसे तो देश के सभी क्षेत्रीय दलों को आत्मकेंद्रित नेतृत्व मिला है। समग्र दृष्टि से देखें, तो एनसीपी, जदयू, राजद, तृणमूल, नेशनल कांफ्रेंस, समाजवादी सभी क्षेत्रीय दलों के क्षत्रप भले ही राज्य में अपनी राजनीति करते हों, किंतु इन सभी क्षत्रपों की निगाह दिल्ली की सत्ता रही है, ये कुंठित राजनीति का हश्र अब साफ साफ दिखाई दे रहा है।
देखें, मोदी विरोध दल और उनके नेतृत्व की आज की स्थिति। कभी कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस और महाराष्ट्र में शरद पवार का एकछत्र साम्राज्य था, इनका आधार मात्र मोदी विरोध के साथ, कहीं न कहीं कांग्रेस का कभी प्रत्यक्ष तो कभी परोक्ष साथ भी था। इनका नेतृत्व सामंतवादी व्यवहार का आदि हो चुका है, अंततः यही अहंकार इन्हें ले डूबा। अभी हाल ही के यूपी के विधानसभा चुनाव में एक और छत्रप के दल समाजवादी पार्टी की दुर्गत की पूरे देश ने देखा। एक और तेज तर्राट क्षत्रप बंगाल की "का का छी छी" करने वाली ममता, अपने राजनैतिक जीवन के सबसे कठिन दौर में है। पार्थ के बाद मंडल की गिरफ्तारी ने उनके लिए परेशानियों को बहुत बड़ा दिया है। ठीक ऐसे ही, अरविंद केजरीवाल अपने मंत्री सत्येंद्र जैन को गिरफ्तारी और अन्य की गिरफ्तारी की संभावनाओं को देखते हुए हैरान परेशान हैं। नवीन पटनायक, स्टालिन, विजयन, जगमोहन आदि क्षत्रपों ने राष्ट्रीय राजनीति के बजाय अपने अपने राज्य की राजनीति को प्रमुखता दी है। दक्षिण से मात्र के सी आर ही मोदी विरोध का प्रमुख चेहरा हैं। कांग्रेस अपने डूबते जहाज को बचाने में उन्हीं खैवनहार के भरोसे है, जो विगत करीब 10 वर्षों से कांग्रेस को बचाने में कुछ खास नहीं कर पाए हैं, अपितु, अभी तो हालत तो ये हैं कि, वे ठीक से स्वयं को भी बचा नहीं पा रहे।
अब "बेगानी शादी में अब्दुल दीवाना" की स्थिति को समझें। नीतीश कुमार द्वारा बिहार राज्य में भाजपा से अलग होकर राजद, कांग्रेस के साथ महागठबंधन को नया स्वरूप दिया और अपना मुख्यमंत्री का पद सुरक्षित कर लिया। जो व्यक्ति अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने की जुगत में कभी भी पलटुराम (ये नाम भी राजद प्रमुख लालू द्वारा दिया गया) बन सकते हैं, अचानक ही उनमें शेष विपक्ष को प्रधानमंत्री की योग्यता नजर आने लगती है, और आगमी लोकसभा चुनाव में मोदी का मुकाबला करने वाला अक्स दिखाई देने लगा। आश्चर्य तो यह भी है कि, जिस भाजपा के सहयोग से ही जंगलराज में नीतीश बाबू का सुशासन बाबू बनना संभव हो पाया, उस कुंठित आत्मकेंद्रित राजनेता नीतीश में मोदी के मुकाबले का सामर्थ्य देखना, इसे मुंगेरीलाल के हसीन सपने नहीं, तो क्या कहा जाए,? मोदी का विरोध ही आज के समग्र विपक्ष की राजनीति का स्वभाव और स्वरूप बनकर रह गया है, इसके अतिरिक्त उनके पास कोई एजेंडा ही नहीं है, यही मोदी की ताकत है।
मात्र क्षेत्रीय दलों के क्षत्रप ही मोदी विरोधी हों ऐसा भी नहीं है। सत्ता तो सत्ता होती है। भाजपा में भी अंतर सत्ता संघर्ष बना हुआ है, इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता है। गाहे ब गाहे दबी आवाज में टीम मोदी के विरोध के स्वर उठते रहते हैं, किंतु सख्त अनुशासन और टीम मोदी की लोकप्रियता के कारण विरोध की आवाजें मुखर नहीं हो पाती, ये अलग बात है। भाजपा शासित कुछ प्रदेशों के मुख्यमंत्री भी अपने अहंकार में आत्मकेंद्रित हो, इन्हीं मोदी विरोधी क्षत्रपों जैसा आचरण करने लगे हैं। देश के हृदय प्रदेश में भाजपा का कार्यकर्ता शंकित है कि, सत्ता प्रमुख का आचरण भी विपक्ष की मोदी विरोधी विचारधारा को हवा दे रहा है। ये भाजपा के लिए खतरनाक सिद्ध होने वाले हैं।
मोदी अपनी ताकत और कमजोरियों को भली भांति समझते हैं, आज तो उनका विरोध, मात्र विरोध करना है, इसलिए जनसामान्य में मोदी विरोध का कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता, और विपक्ष के पास प्रधानमंत्री का सर्वमान्य चेहरा दूर दूर तक दिखाई नहीं देता। हां, विपक्ष के हसीन सपना नीतीश कुमार हैं, और विपक्ष दीवाना है।