
इनके बनने के बाद अधिक से अधिक सीवेज का ट्रीटमेंट होने लगेगा। बता दें, सीवेज ट्रीटमेंट गंदे पानी से हानिकारक पदार्थों, कार्बनिक कचरे और बैक्टीरिया को हटाकर उसे सुरक्षित बनाने की कई चरणों की प्रक्रिया है। इसमें पानी को पुन: उपयोग या पर्यावरण में छोड़ने लायक बनाया जाता है, जिससे जन स्वास्थ्य और जल संसाधनों की रक्षा होती है।
नर्मदा नदी में इसके किनारे के नगरीय निकायों का सीवेज मिल रहा है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने इसे गंभीरता से लिया है। एक याचिका की सुनवाई करते हुए एनजीटी ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि बिना उपचारित पानी, सीवेज, रसायनयुक्त पानी नर्मदा नदी में नहीं मिलना चाहिए। प्रदूषण नियंत्रण मंडल को इसकी निगरानी की जिम्मेदारी दी गई।
मंडल सैंपल लेकर जांच कराता है। इसी तरह से कुछ तालाबों और अन्य नदियों में सीवेज मिल रहा है। उद्योगों की बात करें तो प्रदेश में कुल 32,823 उद्योगों में से 2,324 जल प्रदूषणकारी हैं। हालांकि, रिपोर्ट में प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने दावा किया है कि इनसे 640 एमएलडी दूषित जल उत्पन्न होता है, जबकि उपचार करने की क्षमता 913 एमएलडी है। यानी उपचार के बाद ही पानी छोड़ा जा रहा है।
नगरीय क्षेत्र से निकलने वाले सीवेज को उपचारित करने के लिए अमृत-2 परियोजना सहित अन्य प्रोजेक्ट के माध्यम से काम हो रहा है, पर बड़ी चुनौती ग्रामीण क्षेत्र का सीवेज है। यह लगभग 6,500 एमएलडी है। रिपोर्ट में भी कहा गया है कि प्रदेश में घरेलू दूषित जल (सीवेज) के पर्यावरण अनुकूल प्रबंधन के लिए सभी गांवों में भी एसटीपी लगाने की आवश्यकता है।